रविवार, 11 नवंबर 2012

दीपावली पर दो गीत (डॉ हरीश अरोड़ा)


दीप संध्या 



नयनों के उनके में दीपक जलाऊं
यूं इस बार अपनी दिवाली मनाऊं।

सजनी की पलकों का हल्का लजाना
अधरों को दातों के नीचे दबाना
है जीवन का एहसास खुशियाँ मनाना
अधरों पर अंकित में हर गीत गाऊं
यूं इस बार अपनी दिवाली मनाऊं।

स्वप्नों के रंगों में चाहत सजन की
पलकों के आँगन में महके सुमन की
प्यासी है नदिया प्यासे नयन की
मंजुल छवि से मैं आँचल उठाऊं,
यूं इस बार अपनी दिवाली मनाऊं।

नयन उनके मासूम चंचल दुलारे
अनारों के दानों से झिलमिल ओ' प्यारे
के आँचल में जैंसे जड़े हों सितारे
उन्हें मन के मन्दिर में अपने सजाऊं
यूं इस बार अपनी दिवाली मनाऊं।








मधुर दिवाली 



मधुर मधुर मेरे दीपक से
नेह रूप की जली दिवाली
मंजुल मंजुल सौम्य किरण बन
पलकों के तल पली दिवाली।

कंचन कंचन जल से भीगी 
सजी हुई दीपों की पांती
जीवन में खुशियाँ भर लाई 
उसके अमर रूप की बाती
झनक झनक कोमल पग धर तल 
झूम झूम कर चली दिवाली। 

मधुर सुधा रस से है छलकी 
उसके निर्झर तन की काया 
अधरों के कम्पन से लिपटी
प्रेम सिक्त दीपक की छाया
मन में हंसती ओ' इठलाती 
मेरा मन छल चली दिवाली। 



डॉ हरीश अरोड़ा

www.sahityakarsansad.in
drharisharora@gmail.com

8 टिप्‍पणियां:

  1. श्रंगार रस से लबालब दोनों ही गीत बेहतरीन और लाजवाब हैं ......

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  2. उम्दा लाजबाब सीसर जी ..........आपको, आपके परिजनों और मित्रजनो को भी धनतेरस और दीपावली ही हार्दिक शुभकामनाएं !!!!!!!!!!!

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    1. आपको और आपके परिजनों को भी मेरी और से शुभकामनाएं.

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  3. बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति .पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब,
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये. मधुर भाव लिये भावुक करती रचना,,,,,,

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    1. मदन जी, बहुत बहुत शुक्रिया. गीत आपके मन को छू गए, तो ये गीत सार्थक हो गए.
      आभार,
      डॉ हरीश अरोड़ा

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