बुधवार, 11 जुलाई 2012

धूप की खुली किताब


डॉ हरीश अरोड़ा की कविता 

खुली किताब के 

पहले पन्ने पर
बचपन के आँगन में
तैर गयी
अनखिली धूप।


खुली किताब के
दूसरे पन्ने पर
यौवन के आँगन में
फिसल गयी मदमाती धूप।


खुली किताब के
तीसरे पन्ने पर
बुदापे के आँगन में
सिसक गयी मुरझाती धूप।


.... और फिर
धूप की खुली किताब
बंद हो गयी।

8 टिप्‍पणियां:

  1. वाह. इससे आगे कुछ और क्‍या कहा जाए ...

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  2. सुरमई किरणों के आँगन में मुठ्ठी बांधे जीवन की कली मुस्कुराई पतझड सरीखे मृत्यु ने अपनी एक तीखी वाण चलाई...जीवन की सांसे उखड़ी मौसम ने ली अंगडाई...
    बहुत सुन्दर लिखा है...शब्द नहीं हैं...

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  3. साहित्यकार संसद - एक मंजी हुई पत्रिका ही है और आंतर-बाह्य सुंदरता ने मोह लिया... डॉ. हरीश जी की रचना लाजवाब होती है और यह भी तो... किताब के प्रतीक से जीवन की फिलसूफी को अभिव्यक्त किया... काबिलेतारीफ़ !

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    1. पंकज जी, हिंदी साहित्य को आवश्यकता है कि वह नेट के माध्यम से सभी तक पहुंचे. नव्या ने जो कार्य किया है मैं उसे ही आगे बढाने का प्रयास कर रहा हूँ. कृपया रचनायें भेजते रहे.

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